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लघुकथा

        " मजबूर "                     सन्दीप तोमर काला सोना निकालने की खादान में रमेश की राजेश से मुलाकात हुई। वह औजारों के साथ खादान में काम करने जा रहा था।   रमेश , ‘ प्रणाम , श्रीमान् ! ’’ राजेश ने तीरछी निगाह उसकी तरफ उठायी और थोड़ा तेवर अपनी जुबान पर लाते हुए   कहा , ‘‘ प्रणाम। ’’  रमेश ने बात आगे बढ़ाने की गरज से कहा '' और घर पर सब ठीक हैं ? ’’ राजेश ने कहा , ‘‘ हाँ , सब बढिया हैं , पर तुम्हें मालूम होना चाहिए कि अब मैं यहाँ लेबर नहीं रहा। तुम्हारा सुपरवाइजर हूँ। ’’ रमेश ने कहा , ‘‘ हाँ , राजेश लेकिन हम एक ही गाँव - गली से हैं , और साथ ही मजदूरी करने आये थे। ’’   राजेश ने हिकारत से उसकी ओर देखा और कहा , ‘‘ बेवकूफ इंसान ,  एक गाँव - गली का होने से तुम मेरी बराबरी करोगे ?’’ रमेश ने कहा , ‘‘ मैं आपको याद दिला दूँ कि तुम्हारे पिताजी ,  मेरे पिताजी के खेतों में मजूरी किया करते थे , तीन साल पहले आयी बाढ़ में सब बर्बाद न होता तो आज हमें यहाँ खादान में काम ...

नज्म

  आओ कि कोई ख़्वाब बुन लें { रचनाकारर - साहिर लुधियानवी } आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते वरना ये रात आज के संगीन कठिन दौर समय की डस लेगी जान - ओ - दिल को कुछ ऐसे कि जान - ओ - दिल ता - उम्र फिर ना कोई हसीन ख़्वाब बुन सके गो हम से भागती रही ये तेज़ - गाम उम्र ख़्वाबों के आसरे पे कटी है तमाम उम्र ज़ुल्फ़ों के ख़्वाब , होंठों के ख़्वाब , और बदन के ख़्वाब मेराज - ए - फ़न कला की उँचाई तक पहुँचना के ख़्वाब , कमाल - ए - सुख़न के ख़्वाब तहज़ीब - ए - जिंदगी के , फ़रोग़ - ए - वतन के ख़्वाब ज़िन्दा जीवन के ख़्वाब , कूचा - ए - दार - ओ - रसन के ख़्वाब ये ख़्वाब ही तो अपनी जवानी के पास थे ये ख़्वाब ही तो अपने अमल के असास थे ये ख़्वाब मर गये हैं तो बे - रंग है हयात यूँ है कि जैसे दस्त - ए - तह - ए - सन्ग है हयात आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते वरना ये रात आज के संगीन दौर की डस लेगी जान - ओ - दिल को कुछ...